भागवान के समक्ष दीया क्यों जलाएँ?
पुराने जमाने मे बिजली के प्रसार से पूर्व शाम अँधेरे से भरी होती थी, और दीया प्रकाश का एकमेव साधन हुआ करता था। इसी लिये पूजाघर में दीया प्रज्वलित कर घर रोशन किया जाता था, और प्रार्थना कही जाती थी, जिससे सकारात्मक विचारों का प्रोत्साहन हो।
दीये की समानता विद्या के साथ कियी जाती हैं, उसे अंधकार और अज्ञान का मारक माना जाता हैं। तर्कवाद के नुसार, प्रकाश सकारात्मकता लाता है क्योंकि यह भय और संदेह दूर करता है जो अँधेरे से पैदा होते हैं। चैतन्य को हम जागरूकता या ईश्वर की अभिज्ञता कहते हैं, और दिए में यह विशेष गुण है, जो हमें हमारे वातावरण पर के हमारे ध्यान को बढ़ाता है।
यही ध्यान और चेतना विद्या प्राप्त करने में सहायता करते हैं, जिसके द्वारा हम अपने ध्येय हाँसिल कर सकते हैं।
तेल के दीये की जगह बल्ब या ट्यूब-लाइट क्यों नहीं जलाते?
सवाल तो काफी उचित है, आखिर अंत में उजाला करना और अंधकार ही तो मिटाना है! नहीं नहीं, दिए का महत्व केवल इतने पर सीमित नहीं; दीपज्वलन का आध्यात्मिक महत्व अलग होता है। दिए में भरा तेल (या घी) हमारी वासनाओं, या आवेग में की गयी इच्छाओं का प्रतीक है, व बाती हमारे अहंकार को दर्शाती है। जब आत्म की ज्वाला जलाई जाए तब वासनाएँ आहिस्ते-आहिस्ते निःशेष हो जाती है व अहंकार मिट जाता है।
अग्नि तत्त्व सूर्यदेव का प्रतीक है, जो जीवन और शक्ति के प्रसारक हैं। आपने देखा होगा की ज्योति हरदम ऊपर की दिशा में जलती है; यह मुश्किलों का डट कर सामना करने का पाठ पढ़ाती है, और उच्च आदर्शों का पालन कर ध्येय तक पहुँचने को कहती है। ज्योति आत्मविश्वास और आशा का प्रतीक है।
भगवान संग थोड़ा समय बिताइए और उनसे ख़ामोशी में मन कि सारी बातें कहें और दीये को ऊन लामहो का साक्षी होने दो।
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