रुद्राक्ष
रुद्राक्ष वृक्ष का वनस्पतीशास्त्रीय नाम ‘एलिओकार्पस गेनिट्रस’ है। इस वृक्ष को बेर जैसे फल आते हैं, जिनके अदंर के बीज को रुद्राक्ष कहते है। प्रभु शिव स्वयं रुद्राक्ष माला धारण करते है। ‘रुद्राक्ष’ यह शब्द ‘रुद्र’ (शिव का संहारक रूप) और ‘अक्ष’ (नयन) इन दो मूल शब्दोंसे तैयार होनेवाली एक संधि है।
हलाकि रुद्र रोश के लिये प्रसिद्ध है, परंतु रुद्राक्ष शारीरिक और मानसिक संतुलन को बनाए रखने के लिए धारण किया जाता है। रुद्राक्ष हमारे क्रोधी स्वभाव को अपने अंदरकैद करके बुद्धि, तर्क और स्पष्टता बढ़ाने में मदद करता है।
ऐसा ग्रह प्रचलित है कि रुद्राक्ष केवल ऋषि-मुनि पहन सकते है परंतु सर्व जाति-जमाति, लिंग, व आयु के लोग इसे धारण कर सकते है। प्रत्येक रुद्राक्ष के विविध जीवन क्षेत्र और विविध व्यक्तियों के अनुसार, अपने विशिष्ट गुण होते है। रुद्राक्ष का वर्गीकरण उसकी सतह पर होने वाली रेखाओं के अनुसार किया जाता है, जिसे ‘मुख’ कहते हैं। १ से लेकर २१ मुखी रुद्राक्ष होते है, जिनमें १ – १४ मुखी रुद्राक्ष सामान्य होते है और बाकी दुर्लभ होते हैं।
• एकमुखी रुद्राक्ष साक्षात शिव का रूप है, इसलिए सिर्फ ऋषि और मुनि यह धारण कर सकते है क्योंकि यह रुद्राक्ष भौतिक विश्व से अलिप्तता और आध्यात्मिकता दर्शाता है।
• द्विमुखी रुद्राक्ष शिव का अर्धनारीश्वर रूप दर्शाता है, इस कारण यह रुद्राक्ष विवाहित व्यक्तियों ने धारण करना चाहिए।
• त्रिमुखी रुद्राक्ष अग्निरूप होता है जो भूतकाल के तनाव का निवारण करता है और चित्तवृत्ति को संतुलित रखने में सहाय्य करता है।
• चतुर्मुखी रुद्राक्ष बृहस्पती और उनके सज्ञान स्वरूप से संबधित है। जिन लोगों को बुद्धि या विचारशक्ति उत्तेजित करनी है वह इस रुद्राक्ष को धारण करें।
• षण्मुखी रुद्राक्ष १४ वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए योग्य है क्यों की इससे बच्चों का शारीरक और मानसिक विकास उचित रूप से होता है।
• सप्तामुखी रुद्राक्ष लक्ष्मिरूप है इसलिए जो लोग आर्थिक बल प्राप्त करना चाहते है वह इस रुद्राक्ष को धारण करें।
• अष्टमुखी रुद्राक्ष, जिसे विघ्नहर्ता भी कहा जाता है, गणेश रूप है जो जीवन में आने वाले कठिनाईयों को नष्ट करता है।
• नवमुखी रुद्राक्ष दुर्गा रूप है जो आत्मविश्वास और इच्छाशक्ती बढ़ाता है।
• दशमुखी रुद्राक्ष विष्णु रूप है जो गड़बड़ी में भी स्थितप्रज्ञ रहने में मदत करता है। नवमुखी रुद्राक्ष की तरह यह भी आत्मविश्वास बढ़ाता है।
• एकादशमुखी रुद्राक्ष धारण करने से वस्तूनिष्ठ निर्णय लेने का बल प्राप्त होता है और ज्ञानेंद्रीयों एवं शब्दसंग्रह पर नियंत्रण मिलता है।
• द्वादशमुखी रुद्राक्ष उसके तेज और चैतन्य के लिए जाना जाता है। सूर्य की उज्वल पहलु दर्शाकर यह रुद्राक्ष दृढ़ता बढ़ाता है।
• गौरी-शंकर (त्रयोदशमुखी) रुद्राक्ष १४ वर्ष के ऊपर के सभी लोग खुद का अंतर्गत संतुलन बनाये रखने के लिए धारण कर सकते है। ऐसा माना जाता है की यह रुद्राक्ष सप्त चक्र की सक्रीयता के लिए जिम्मेदार होने वाले इदा और पिंगला नाड़ियों को संतुलित रखता है।
• चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष हनुमान रूप है जो ताकद और समर्पण को दर्शाता है।
• पंचादश मुखी और शोडषमुखी रुद्राक्ष शारीरिक विकारों का निवारण करता है। पंचादशमुखी रुद्राक्ष खिन्नता, हृदय व रक्तवाहिनीसंबंधी या श्वसन संबंधी दोष से मुक्तता प्राप्त कर देता है ।
• इन सब में से सबसे अधिक प्रचलित रुद्राक्ष पंचमुखी रुद्राक्ष है जो मनःशांति, एकाग्रता, एवं स्मरण शक्ति की क्षमता बढ़ाने में प्रभावी है।
यह याद रखें कि रुद्राक्ष धारण करना एक वचन है और इसे निर्धारित रिवाज के अनुसार ही करना चाहिए; रुद्राक्ष को पहनने से पहले पवित्र करना चाहिए। रुद्राक्ष को संभालने की शैली से उसका प्रभाव निश्चित होता है, न की उसके आकार से। रुद्राक्ष धारण करने से पहले उसे संस्कारित और उर्जित किया जाता है; प्रथा के अनुसार रुद्राक्ष को २४ घंटे शुद्ध घी में रखना चाहिए और उसके बाद और २४ घंटे दूध में। फिर इसे स्वच्छ मुलायम कपड़े से साफ़ करने के बाद ही धारण करना चाहिए। हर ६ महीने या एक वर्ष के पश्चात रुद्राक्ष पर संस्कार कर के उसे उर्जित करना चाहिए।
ब्राम्हण के जनेऊ की तरह रुद्राक्ष व्यक्ति के अंग से उसके शक्तियों के साथ एकनिष्ठ होता है। शपथ लेने के बाद रुद्राक्ष को बाकि गहनों की तरह कहीं भी नहीं रखना चाहिए या किसी को देना नहीं चाहिए। खुद की शारीरिक स्वच्छता का ध्यान रखते समय रुद्राक्ष को किसी स्वच्छ जगह पर रखें या फिर किसी मुलायम कपड़े में लपेटकर किसी सुरक्षित जगह पर रखें।
हमने अभी तक रुद्राक्ष मणि के बारें में जाना, अब हम रुद्राक्ष की जपमाला के बारें में समझेंगे। इसके संस्कार भी रुद्राक्ष मणि के तरह हो होतें है। सर्वसमान्यतः जप करते समय १०८ मणि होनेवाली जपमाला का इस्तेमाल किया जाता है परंतु रुद्राक्ष माल में १०८ मणि होना आवश्यक नहीं। रुद्राक्ष माला में ज्यादातर ८४ मणि होते हैं, १०८ मणि होने सेमाल लम्बी हो जाती है और उसका अन्य वस्तुओं से संपर्क हो सकता है।
आशा है की इस रुद्राक्ष से आपको स्थैर्य और शांति मिले।
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