होली की गाथा
अगले हफ्ते हम वैदिक पंचांग के अनुसार आखरी और अंग्रेजी पंचांग के अनुसार दूसरा त्यौहार – ‘होली’ मनाएंगे। हम अनेक वर्षो से होली के दिन शाम को लकड़ियाँ जमाकर होलिका दहन करते आ रहे है परन्तु इसके पीछे का कारण हम नहीं जानते। आईये जानते है की यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है और किस तरह से मनाया जाता है।
होलिका दहन के पीछे जो कहानी है वह है राजा हिरण्यकश्यपू और उसके बेटे प्रल्हाद की। राजा हिरण्यकश्यपू ने एक अनोखा वरदान मागा था यह की उसे न कोई शस्त्र ना कोई अस्त्र से, न घर के अन्दर ना घर के बाहर, न सुबह ना शाम को और न किसी मनुष्य ना किसी जानवर के हात से मरण आएगा। इस वरदान की वजह से हिरण्यकश्यपू खुद को देव समझने लगा और जो कोई उसकी पूजा नहीं करेगा उस पर वह अत्याचार करता था।
उसके बेटे प्रल्हाद को अपने पिता का देवत्व मान्य नहीं था, वह विष्णु भक्त था। वह हर वक्त विष्णु का नामस्मरण करता था जिसकी वजह से हिरण्यकश्यपू को बहोत गुस्सा आ गया। हिरण्यकश्यपू ने प्रल्हाद को बहोत समझाने की कोशिश की परन्तु प्रल्हाद निडरता से विष्णुजी की आराधना करता रहा। जब राजा को समझा की प्रल्हाद पर किसी चीज का परिणाम नहीं होगा और वह अपने पिता के देवत्व को मान्य नहीं करेगा तो हिरण्यकश्यपू ने अपने बेटे को खत्म करने का सोचा। परन्तु उसका यह प्रयत्न भी निष्फल रहा। प्रल्हाद एक इतना सच्चा भक्त था के हर वक्त प्रल्हाद पर कोई संकट आनेपर तो विष्णुजी उसको संकट से बाहर निकालते थे।
यह देखकर हिरण्यकश्यपू ने संतप्त मन से प्रल्हाद को मारने के लिए अपने बहन को बुलाया। उसका नाम था ‘होलिका’ और उसे भी एक वरदान मिला था। वरदान यह था की उसे अग्नि दाह मेहसूस नहीं होगा और यदि अग्नि से संपर्क हुआ तो भी वह सुरक्षित रहेगी। राजा ने आग जलाने का आदेश दिया और होलिका को प्रल्हाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा, इस प्रकार प्रल्हाद का अंत होगा। परन्तु विष्णुजी ने इस परिस्थिति से भी प्रल्हाद का बचाव किया और होलिका ने इसी आग में जलकर मरण पाया। होलिका को मालुम नहीं था की इस वरदान का उपयोग तब ही होगा जब वह आग में अकेली होगी, यदि उसने किसी और को आग में सहभागी किया तो इस वरदान का उपयोग नहीं होगा।
इस घटने का प्रतिक बनकर होलिका दहन प्रचलित हुआ। हर साल फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा पर होलिका दहन किया जाता है। इस दिन शाम को सूर्यास्त के बाद होलिका दहन सर्व जगह मनाया जाता है। होलिका दहन के लिए लकड़ियाँ, कंडा, सुखी घास को इक्कठा कर के उसमे दो आकृतियों को रखा जाता है। एक आकृति होलिका का प्रतिक होती है जिसे ऐसे चीजों से बनाया जाता है जो आसानी से जल सके और दूसरी आकृति प्रल्हाद का प्रतिक होती है जिसे ऐसे चीजों से बनाया जाता है जो जल न सके। महाराष्ट्र में इस दिन पूरनपोली का नैवेद्य चढ़ाने की प्रथा है। होली के दिन बच्चे टिमकी बजातें है और बड़े लोग जमकर, मुह पे उल्टा हात रखकर चिल्लाते है। इस दिन मन में होने वाले असंतोष, शत्रुत्व को नष्ट किया जाता है।
अगले गिन ‘धुलवड’ मनायी जाती है। अगले दिन जब होली की आग शांत हो जाती है तो बची हुई राख के साथ खेला जाता है। सब लोग मिलकर इस राख को एक दुसरे के अंग पर लगाते है। ऐसा समझा जाता है की अंग पर राख लगाने से ग्रीष्म ऋतू में अंग पर आने वाली घमोरियां काफी कम हो जाती है। आधुनिक काल में इस राख की जगह रासायनिक या ऑर्गनिक रंगोंने ली है।
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