पवित्र अंक १०८ का उद्गम
हिंदु शास्त्रों व पुराणों में १०८ अंक का अत्यधिक उल्लेख है। जपमाला में १०८ मनके होते हैं, और हर जाप या मंत्र १०८ बार बोला जाता है, कभी सोचा है क्यों? सत्यनारायण पूजा में हम १०८ तुलसी के पत्ते भगवन कृष्ण को अर्पित करते हैं, विष्णुसहस्रनाम में १०८ श्लोक हैं, भगवान गणेश के १०८ नाम हैं, और श्रीयंत्र में भी १०८ प्रतिच्छेदन बिंदु हैं। शक्ति के १०८ पीठ हैं, काफी बौद्ध तीर्थस्थानों में १०८ सीढ़ियां और १०८ स्तम्भ हैं।
ऐसे भला क्यों होगा?
हमारा प्राचीन विज्ञान, आयुर्वेद बताता है कि तन पर १०८ दाब बिंदु होते हैं, जहाँ चेतना और माँस के मिलन से मानव को जीवन प्राप्त होता है। खगोलशास्त्र प्रमाणित करता है कि सूर्य और चंद्र के बीच का अंतर सूर्य के व्यास से १०८ गुना है, व चंद्र-पृथ्वी के बीच का अंतर चंद्र के व्यास से १०८ गुना है। यह भी कहा गया है कि सूर्य का व्यास पृथ्वी के १०८ व्यासों के बराबर है।
१०८ का उल्लेख वेदों में शिव-शक्ति के निरूपण स्वरुप किया गया है। शिव को परिशुद्धता और सादगी का चिन्ह समझा जाता है; यह गुण पारम्परिक रूप से पुल्लिंगी समानता से सम्बंधित हैं। शक्ति स्त्रीलिंगी समानता, अराजकता और जटिलता का प्रतीक है। उनका संयोग संतुलन दर्शाता है।
सूर्य, जो शिव का प्रदर्शक है, एक वर्ष में ३६० अंश के राशिचक्र की एक परिक्रमा पूरी करता है। २७ नक्षत्र भी आकाश में ३६० अंश का चक्र बनाते है। हर नक्षत्र के ४ पद गिनें तो २७ x ४ = १०८ पद बनते हैं। नक्षत्रों पर चंद्र का राज होता है, जो शक्ति का प्रदर्शक है।
सूर्य-चंद्र शिव-शक्ति द्वारा सृष्टि की दिव्या ऊर्जा को दर्शाते हैं। शक्ति शिव को संतुलित रखती है, इसलिए १०८ को पवित्र मान कर शास्त्रोक्त महत्व दिया गया है। किसी भी शुभ मंत्र का उच्चरण १०८ बार करके हम उसे लौकिक शक्ति प्रदान करते हैं। १०८ बार बोलने से शक्ति उस मंत्र की ताकत बढाती है और उस मंत्र के परिणाम को भी उत्तेजित करती है।
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