शिव शंकर शंभो
“शिव शंकर शंभो”
यह वाक्य हमने नामस्मरण के दौरान कई बार सुना होगा परन्तु हम इन शब्दों की उत्पत्ति पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। आज हम इस ब्लॉग के माध्यम से शिव और शंकर इन दोनों में फर्क क्या है और शिव के अलग अलग रूप कौनसे है यह जानेंगे।
शिव, शंकर, शंभो यह तीनों एक ही देव के अलग अलग नाम है। शिव मतलब साक्षात आदि देव। हम ऐसा कह सकते है कि ‘शंकर’ शिव से ही प्रजनित हुआ है। जब हम त्रिमूर्ति का नामस्मरण करते है – ब्रम्हा, विष्णु और महेश, उनमें ‘महेश’ यह ‘माहा’ और ‘ईश’ इन दोनों शब्दों की संधि है। ईश यह ‘ईश्वर’ का मूल शब्द है।
शिव को रचयिता और विनाशक कहा जाता है, जो इस सृष्टि के जीवनचक्र का प्रतिक है। शिव का ‘वीरभद्र’ रूप उनकी विनाशकारक प्रकृति को दर्शाता है। ऐसा कहते है की शून्यता से जो परम चेतना या परम बोध प्रकट हुआ वह शिव है। शिव को किसीने निर्माण नहीं किया, वह खुद निर्माता है इसीलिए उन्हें ‘स्वयंभू’ केहते हैं। ‘शिव’ रूप ‘शंकर’ की संकल्पना से पूर्व प्रचलित हुआ। शिव का अस्तित्व वेदों से पूर्वकालीन है और उनकी उपासना शिवलिंग के माध्यम से की जाती है। यह रूप सरलता और आध्यात्मिकता दर्शाता है। ‘सदाशिव’ नाम इसी रूप पर आधारित है, अर्थात सर्वव्यापी अथवा शांत स्वभावी व्यक्ति। इस रूप का चित्र देखें तो व्याघ्र चर्म धारण किया हुआ, वैराग्य रूप में शिव हमे नजर आते हैं। शिव एक सरल, भोला देव है जिसे भव्य पूजा, त्याग, होम हवन इत्यादि की आवश्यकता नहीं, उन्हें केवल आपकी निष्ठा, भक्ति और श्रद्धा पर्याप्त है। यदि एक भक्त पूरे मन से तपस्चर्या करता है, तो शिव तुरंत खुश हो कर उसे वरदान देते हैं। इस भोले स्वभाव के कारण शिव को ‘भोलेनाथ’ नाम पडा।
‘शंकर’ यह नाम मुख्यतः पार्वती के साथ जोड़ा जाता है। हम ज्यादातर ‘गौरी शंकर’ या ‘शंकर और पार्वती’ कहते है, ‘शिव पार्वती’ का ज़िक्र शायद ही कभी होता है। पार्वती (स्री) शिव के साथ विवाह करने के लिए तपस्चर्या कर रही थी तो शिव संसार में प्रवेश करते समय ‘शंकर’ रूप में प्रकट हुए। मोह-माया से वंचित, तपस्चर्या से सिद्धि प्राप्त करने वाले शिव का अस्तित्व पुरुष में परिवर्तित हो गया, जिसे भौतिक वस्तुओं में दिलचस्पी है।
सती ने जब खुद को अग्नि में अर्पण कर मृत्यु पाई तब शिव का सती से विवाह न हो पाया और शिव को कोप चढ़कर उनका रौद्र अवतार समक्ष आया। इस रौद्र अवतार से शिव के ‘रूद्र’ नाम का उद्भव हुआ। जब शिव का शिष्टाचार छूटकर उनकी पशुता, उग्रता, एवं अग्नि तत्त्व बाहर आता है, उसे रूद्र कहा जाता है। रूद्र को तर्क, युक्ति, संतुलन इनमें से किसी की परवाह नहीं होती, उन्हें केवल क्रोध शांत करके शिव रूप में लौट जाना होता है। रूद्र अवतार शंकर से पहले प्रकट हुआ था।
जब पार्वती और शिव का विवाह हुआ, तब उन्होंने उनका वैरागी, सन्यासी जीवन त्यागकर शंकर के रूप में लौकिक, सांसारिक जीवन में आगमन किया। शंकर गृहस्थ होते हुए भी भौतिकता नाही दर्शाते। शिव अपना संतुलन कभी नहीं छोड़ते। रूद्र भी उसका कोप शांत होने पर शिव रूप में समा जाता है; इसलिए शंकर भौतिक वस्तुओं का प्रतिक नहीं है। शंकर की आकांक्षा, कामना संसार की वजह से बढ़ने लगी। यहाँ शंकर की प्रतिमा तैयार हो गई जिसे हम अब मंदिरों की मूर्तिंयों में पाते हैं।
शिव और शंकर यह दो अलग नहीं बल्कि एक ही हैं; शिव जिस जीवनचक्र को दर्शाता है उस चक्र का एक संक्रमण शंकर है। लोगों को इन दोनों में फर्क समझने में आसानी हो, इसलिए शिव की वैराग्य रूप के चित्र प्रचलित किये गए। तो, शंकर एक देव है जिसकी हम मूर्ति बनाते है और शिव एक सर्वव्यापी आध्यात्मिक अस्तित्व है।
शम्भो (शम्भु) यह शब्द बोली भाषा से तैयार हुआ है। हमने देखा की शिव को स्वयंभू भी कहा जाता है। अगर इस शब्द का उच्चार हम हम तेज़ी से करें तो ‘शम्भो शम्भो’ सुनाई देता है। इस प्रकार शिव को शम्भु यह नाम मिला।
तो आईये हम इन्ही शिव का स्मरण करें
जय शिव शंकर नमामि शंकर शिव शंकर शम्भू ।
जय गिरजा पति भवानी शंकर शिव शंकर शम्भू ॥
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