उत्तरायण और दक्षिणायन
हम जानते हैं की साल में दो संक्रान्तियाँ या अयनांत होते हैं, जो पूर्व-पश्चिम दिशात्मक अक्ष पर पृथ्वी की गति दर्शाते हैं। सूर्य की एक परिक्रमा करने के लिए हमें एक वर्ष लगता है, अर्थात पूर्व-पश्चिम व् पश्चिम-पूर्व। हमारी स्थिति के कारण लगता है कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। इसलिए दिसंबर-जून (ग्रीष्म संक्रांति) के दौरान सूर्य दक्षिण से उत्तर और जून-दिसंबर (शीत संक्रांति) में उत्तर से दक्षिण कि ओर स्थानांतर करता है।
ग्रीष्म संक्रांति को हम उत्तरायण के नाम से जानते हैं। यह २२ दिसंबर के आस-पास शुरू होकर अगले ६ महीने तक जारी रहता है। हम इस वक़्त शिशिर ऋतु, बसंत एवं गर्मी के उत्तरार्ध का आनंद उठाते हैं। उत्तरायण सकारात्मकता का प्रतीक है और इस कालावधि में शुभ कार्य प्रोत्साहित किये जाते हैं। उत्तरायण में दिन की अवधि रात्रि से अधिक होती है।
दक्षिणायन यह नाम शीतकालीन संक्रांति को दिया गया है, और इसकी शुरुआत २२ जून के करीब होती है। दिन के समय में नमूदार परिवर्तन नज़र आता है: रात के समय ज्यादा होता है। प्रारंभिक दिनों में हम वर्षा ऋतु का आनंद लेते हैं और उसके पश्चात् शरद ऋतु व शिशिर ऋतु की शुरुआत का अनुभव लेते हैं। दक्षिणायन नकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है जिसकी वजह से इस काल में शुभ कार्य या विधि करना प्रोत्साहित नही किया जाता।
उत्तरायण को हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति के उत्सव द्वारा मनाया जाता है जो वास्तविक उत्तरायण गति के काफी नज़दीक पड़ती है। पुराणों में उत्तरायण के पावित्र्य के अनेक दृष्टांत हैं- गंगा माँ ने पृथ्वी पर इसी दिन प्रवेश किया था यह मान्यता है; भीष्म पितामह ने बलिदान देने हेतु उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी।
माघ स्नान की विधि में पवित्र नदियों में स्नान करने की सलाह दी गयी है, और यह कार्य उत्तरायण के दौरान ही संपन्न किया जाता है। इसके पीछे यह समझ है कि गर्मी का मौसम स्वच्छ आकाश और देवज्ञान अपने साथ लाता है। कुछ इसी प्रकार, दक्षिणायन का धूमिल आसमान रात से संबंधित है। साधना की दृष्टी से उत्तरायण ज्ञानप्राप्ति के लिए और दक्षिणायन शुद्धिकरण के लिए उचित है।
इस वर्ष उत्तरायण समाप्त होकर १६ जुलाई २०२२, शनिवार के दिन दक्षिणायन का प्रारंभ होगा।
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