Part – 2 Vashya Kuta (Goon Milan)
पिछले भाग में हम ने वर्ण कूट और उसकी ४ श्रेणियाँ देखीं जो अष्टकूट में १ गुण जोड़ती है। आज हम अष्टकूट के एक और भाग, वश्य कूट को परखेंगे। ३६ गुणों में से वश्य कूट अधिकतम २ गुण का योगदान दे सकता है।
वैदिक शास्त्र में सर्व राशियों व नक्षत्रों का विचार चंद्र के स्थान के हिसाब से किया जाता है। इस निबंध में हम वश्य कूट की प्रासंगिकता और विवाह संबंधी उपयोग का अभ्यास करेंगे।
वश्य कूट यह अष्टकूट का दूसरा हिस्सा है।
‘वश्य’ शब्द का अर्थ होता है किसी पर नियंत्रण रखने की क्रिया, जोड़ीदार पर स्वयं का प्रभाव होना या उस पर मनमानी करना। पूर्व काल में अपेक्षा होती थी की महिलाएँ अपने पति के नियमों और सिद्धांतों का पालन करे, और वश्य कूट से देखा जाता था की वर का वधु पर कितना प्रभाव होगा। परंतु अब सामाजिक संस्था बदल रही है, आज की स्त्री दूसरों के नियंत्रण को नहीं मानती; वश्य कूट का उपयोग अब दांपत्य की अनुकूलता और रिश्ते की मजबूती परखने के लिए होता है। यह वैवाहिक रिश्ते की चुंबकीय तासीर की जांच करता है, और यह भी बतात है की दोनों में से किसकी प्रबलता अधिक होगी।
वश्य कूट राशियों को पांचश्रेणियों में बाँटता है और प्रत्येक श्रेणी एक प्रकार का स्वाभाव दर्शाती है जो अन्य श्रेणियों से तोला जा सके। राशियों के प्राणी-रूप चिन्ह भी निम्न श्रेणियों को पहचानने में सहायता करते हैं:
१. चतुष्पाद: मेष, वृषभ, धनु और मकर (सिंह छोड़कर)
२. मनुष्य अथवा द्विपाद: मिथुन,कन्या, तुला, धनु का अगला हिस्सा और कुंभ
३. जलचर: कर्क का आधा हिस्सा, मकर, कुंभ और मीन,
४. वनचर: केवल सिंह राशि
५. कीट: केवल वृश्चिक राशि
वश्य कूट एक ही श्रेणी का हो तो अनुकूलता उत्तम मानी जाती है। एक मिलन को दो में से अंक दिए जाते हैं। शास्त्र कहता है की ग्रह सुसंगति या असंगति अपनी प्रकृतिनुसार दर्शाता है। यदि दांपत्य का वश्य कूट अनुरूप हो, तो उनका वैवाहिक ऐक्य औरों से बेहतर होगा।
सिंह एकमेव राशि है जो सारी राशियों पर नियंत्रण करने की शक्ति रखती है, सिवा वृश्चिक के।
मिलन हेतु निम्न तालिका का इस्तेमाल करें:
वर → वधु ↓ | चतुष्पाद | मनुष्य | जलचर | वनचर | कीटक |
| चतुष्पाद | 2 | 1/2 | 1 | 0 | 2 |
| मनुष्य | 1/2 | 2 | 0 | 0 | 0 |
| जलचर | 1 | 0 | 2 | 2 | 2 |
| वनचर | 0 | 0 | 2 | 2 | 0 |
| कीटक | 2 | 2 | 2 | 0 | 2 |
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