धनतेरस और लक्ष्मी पूजन की भिन्नता
आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की तेरहवी तिथि को उत्तर-पश्चिमी भारत में धनतेरस के नाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में यह त्यौहार धनत्रयोदशी के नाम से प्रसिद्ध है। इस वर्ष की धनतेरस २ नवंबर, मंगलवार सुबह ११:३१ से शुरू होकर ३ नवंबर, बुधवार सुबह ०९:०२ पर समाप्त होने वाली है, धनतेरस लक्ष्मी पूजन से २ दिन पहले मनाई जाती है।
लक्ष्मी पूजन आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर किया जाता है, जब चंद्र स्वाति नक्षत्र में हो। इस साल लक्ष्मी पूजन का शुभ समय (अमावस्या + स्वाति नक्षत्र) ४ नवंबर सुबह ०७:४२ से देर रात ०२:४४ तक है। आम तौर पर इस पूजा की विधि स्थिर लग्न राशि में की जाती है जिसकी मदत से संपत्ति (लक्ष्मी) बनी रहे, बढ़े पर खर्च ना हो। हमेशा पूजा उस मुहूर्त पर करनी चाहिए जो विधि करने वाले की जन्म कुंडली को शुभ लाभ दे।
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धनतेरस और लक्ष्मी पूजन में एक भिन्नता है; धनतेरस पर हम देवों के वैद्य एवं आयुर्वेदिक औषधि के देवता, धन्वंतरी के अवतरण के स्मरणार्थ मनाते हैं; उनके हाथ में अमृत कलश और आयुर्वेद की पोथी चित्रित की जाती है। धन्वंतरी को विष्णु का रूप भी बताया गया है, और उनकी उपासना परिवार के स्वस्थ हेतु की जाती है। अच्छी सेहत भी हमारे जीवन में भाग्य लाती है। उसी दिन पर देवों के कोषाध्यक्ष, लक्ष्मी-कुबेर की भी पूजा होती है, जिन्हे भौतिक संपत्ति और समृद्धि का चिन्ह माना गया है।
लक्ष्मी देवी की उपासना दौलत, धनवंता व वंश वृद्धि के लिए की जाती है। दीपावली में अश्विन अमावस्या की रात को लक्ष्मी उस घर में प्रवेश करती है जो सबसे स्वच्छ, ज्योतिर्मय और सजा हो। इसलिए हम दिवाली में अपने घरों में रौशनी फैलाकर रंगोलियाँ बनाते हैं।
आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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