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गणेश मूर्ति की सूंड किस दिशा में हो?

घर या कार्यालय में बाएं ओर झुकी सूंड की मूर्ति रखनी चाहिए (अर्थात सूंड गणेश के बाएं हाथ की तरफ मुड़ी हो)। अब यदि गणेशोत्स्ताव हो, देवालय के लिए हो, या घर की सजावट के लिए टांगी तस्वीर हो, रूप के साथ ही उसकी सूंड की दिशा परख कर चुनाव करना चाहिए।


आम तौर पर तीन प्रकार की आकृतियाँ देखने को मिलती हैं: बाईं, दाईं और सीधी (यह पेट की ओर 9मुड़ी हुई भी हो सकती है)।
मनुष्य देह की ऊर्जा तीन हिस्सों में विभाजित है जो नाड़ियों द्वारा विनियमित रहती हैं। नाड़ी माने नस नहीं।


शरीर का बाँया हिस्सा इड़ा नाड़ी के आधीन होता है जिस पर चंद्र का वर्चस्व है। इस वजह से उसे स्त्रीत्व सामान मृदु, सौम्य और शीतल गुणों का लाभ हुआ है। इससे हमें मनःशांति, सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। बाईं सूंड की गणेश मूर्ति रूढ़ि या सख्त नियमों से बंधी नहीं होती, इसलिए उसकी स्थापना घर-कार्यालयों में की जाती है जहाँ उसकी आराधना करना आसान हो। इस प्रकार की मूर्ति को बालरूपी गणेश के नाम से भी जाना जाता है।


देह की दाहिनी बाजु का परिपालन पिंगला नाड़ी करती है। इस ऊर्जा का स्रोत साक्षात सूर्य होने के कारण हमे अग्नि तत्त्व का आभास होता है। एक नर की तरह यह ऊर्जा अनुशासन, रुद्रावतार और दाह दर्शाती है। उग्र रूपी गणेश, जिसकी सूंड उसके दाए हाथ की ओर होती है, प्रार्थना में भक्ति, एकाग्रता और ईमानदारी की अपेक्षा के साथ आता है। विधियों में सख्त नियमों का पालन करना जरुरी है, और यह समस्त परिवार को लागू होते हैं।


तीसरा प्रकार, जहाँ सूंड न दाईं न बाईं ओर परन्तु सीधी बहार की ओर या पेट की दिशा में झुकी हो, उसे उर्ध्वा मुखी कहते हैं। इस प्रकार की मूर्ति बहुत दुर्मिल होती है। गणेश के इस रूप को बुद्धि वर्धक मानते हैं। शरीर के मध्य से गुजरने वाली ऊर्जा पर सुषुम्ना नाड़ी का शासन होता है, जो सर्वतः समतोल समझी जाती है। इस वजह से उर्ध्वमुखी को शुभ स्थान प्राप्त हुआ है।


गणेशमूर्ति चुनते समय चेहरे के हाव-भाव व सूंड की दिशा के साथ आसन की शैली पर भी गौर करें। संभवतः पद्मासन में बैठे गणेश को चुनें। सुखासन धारण किये या खड़े हुए गणेश अक्सर ढीले या निकलने को तत्पर लगते हैं परन्तु पद्मासनी गणेश एकाग्र और स्थिर होते हैं। तो आपकी आराध्य क्षमता और पसंद नुसार जल्द ही गणपती बाप्पा को घर ले आएँ।


ll गणपती बाप्पा मोरया ll

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