पूजा मे सुपारी का महत्व
जब भी हम कोई पूजा, हवन, मंगल कार्य या पारंपारिक विधि करते है, तब विशेष वस्तुओं में हल्दी-कुमकुम के बाद सुपारी का स्थान होता है । क्या आपने कभी सोचा है की हिन्दू शास्त्र में सुपारी को इतना महत्व क्यों है? सुपारी के गुण, उत्पत्ति और उपयोग के बारें में हम इस प्रस्तुत ब्लॉग में जानकारी हासिल करेंगे ।
सुपारी को संस्कृत भाषा में ‘पूगीफल’ और अंग्रेजी में ‘बीटल’ या ‘ऐरेका नट’ कहते है, और यह पूजा और दैनिक जीवन में एक बहोत महत्वपूर्ण वस्तु है । सुपारी, ‘ऐरेका पाम’ नाम के पौधें का फल होता है, जो गोलाकार, सफ़ेद रंग और काष्ठमय पोत का, तोड़ने में कठिन और जिसका कसैला स्वाद होता है ।
सुपारी की विशेष गुणों की वजह से इसका स्थान फलों में सबसे उपर है । सुपारी के पौधें को ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता है — ऐसा वृक्ष जिसके सारे अंग का उपयोग किया जा सकता है और कुछ भी बेकार नहीं जाता ।
इस फल के कठिनता का कारण इसका रासायनिक आबंध है, इसके अणु का आसंजक (जोड़ने वाला) बल बहोत ज्यादा होता है । सुपारी को ‘वर्षायु फल’ भी कहा जाता है क्योंकि इसे तैयार होने के लिए एक साल लगता है, इसीलिए तीनों ऋतु अपने संस्कार इस फल को देते है । ऐसा कहा जाता है की यह फल इसके बल की वजह से तीनों ऋतु में बना रहता है जो निष्ठा, प्रतिबद्धता, मजबूत रिश्ता और उपयोगिता दर्शाता है ।
सुपारी के उतपत्ति का काल और कब से यह धार्मिक कार्यो में इस्तेमाल होने लगा यह अस्पष्ट है पर आयुर्वेद में कुछ सन्दर्भ पाएं गायें है । आयुर्वेद में बताया गया है की सुपारी का कसैला स्वाद कफ नाशक होता है, परन्तु यदि इसका अधिक मात्रा में सेवन होता है तो वात दोष बढ़ सकता है । सुपारी में अधिक मात्रा में फाइबार होता है जो कोलेस्ट्रोल (पित्त-सांद्रव) को कम करता है ओर कैल्शियम को नियमित रखने में मदद करता है । इसका मुख शुद्धि के लिए भी सेवन किया जाता है, एक छोटा टुकड़ा पाचनक्रिया को सुधारता है और अधिक लार को कम करता है ।
हिंदू शास्त्रों में सुपारी को जीवित देव का स्थान प्राप्त है; यह गणेश देवता का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है । यदि कोई पत्नी धार्मिक कार्य में उपस्थित ना हो, तो सुपारी को रखा जाता है । खाने वाली सुपारी और पूजा की सुपारी दोनों अलग वस्तुएं है । खाने वाली सुपारी बड़ी और गोल होती है, वहीं पूजा की सुपारी छोटी और शीर्ष पर शिखर जैसे आकार की होती है । मुझे लगता है, नारियल को भी पूजनीय स्थान दिया गया है, परन्तु सुपारी के छोटे आकार की वजह से इसे पूजा में इस्तेमाल किया जाता होगा और साथ ही यह पूजा को व्यवस्थित रूप देता है ।
इसलिए, हम ऐसा कह सकते है की सुपारी के इंसारे विशेष गुणों की वजह से इसे देवत्व दिया गया होगा । पूजा या कार्य के रूप के अनुसार इस्तेमाल होने वाली सुपारी की संख्या बदलती है परन्तु इसका महत्व कभी नहीं बदलता ।
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